गुरूजी आपसे प्रिय हैं आपकी बातें
फिर भी आप मुझे क्यों नहीं हैं समझाते
कि आप अब क्यों नहीं आते
होती हैं आपसे जितनी भी मुलाकातें
लगती हैं मुझे नायब सौगातें
जगती हूँ कि आपको जाने ना दूँ
इस पहर को बीत जाने ना
आपसे आपके पैगाम भी ले लूं
इस तरह हो जाती हैं मुझे प्रभातें
सूर्य में आपके होते रहे दरस ऐसे
चांदनी में चाँद छुप जाए जैसे
सुबह से आपके मिलने को कड़ी धूप में
आते रहते हैं बस आपके संदेशे
फिर धूप में खड़ी रहूँ, देखूँ आपको कैसे
ऐसे हो जाती है संध्या मेरे इंतज़ार की ऐसे
शाम ढल जाए तो पूछूं मैं किसे ???
ना चाँद, ना सूरज, ना तारे !!!!
बताएं मुझे आप तक जाने के रस्ते....
मुस्कुराते रहते हैं मुझे त्रस्त यूँ देखकर
दया भी ना आये अब, हुए आप कठोर क्यों ???
लेते रहते आप मेरी परीक्षा और इम्तिहान क्यों ???
देते नहीं अपना कोई भी आप हैं निदान क्यों ???
पृष्ठ मैं गर पढ़ सकूँ तो पढ़ भी लूं, पढ़ भी लूं ...
साफ़ हैं तुमरे बिने पन्ने मेरी क़िस्मत के भी
गम नहीं गर आप हों तो फिर भी कोई गम नहीं
मेरे लिए विश्राम है जीवन अगर हम तुम नहीं
मेरे लिए आये मधु, विष से भी वोह कम नहीं
"यत्र- तत्र और सर्वत्र, भूगर्भ और भूताल में
जिंदगी के सार में, सचरित्र और अवतार
में,
अधबुझी सी प्यास में, आपके इस प्यार में,
आपके हर श्वास में, आपके ही पास हूँ
कहते हैं ये प्रभु अब तो आपके ख्वाब भी
मैं तुम्हारे संग हूँ और तुम्हारा राजदार भी
मेरे ही रंग में रंग जाओगी तुम एक दिन
मेरे लिए मंजिल भी पाओगी तुम एक दिन
मेरे लिए जिंदगी को छोड़ भी पाओगी तुम एक दिन
मत करो अब इंतज़ार, मैं कल भी था और आज भी"
जय गुरूजी
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